Latest Posts

बुधवार, 30 मई 2012

टूट कर तो पास था जीत कर बिख़र गया



पंजाब का दो काव्य आबा 







 









 देविंदर सिंह जोहल की क़लम से

1
एक पल ग़ुफ़ा में

तेरी आंखों से
पानी किस बात पे निकला
कुछ पता ना चला

ना तू ग़मगीन थी
न हालात नमकीन थे
बस मै बोल रहा था
या शायद
मेरा अपनापन खुल रहा था
किसी ग़ुफ़ा के दरवाज़े जैसा

दरीचे पे सूर्य का पहरा था
भीतर बुझ चुके दीप की महक थी
या लौ पे जल रहे मास की दुर्गंध
यकायक तेरी आवाज़ में
न जाने कहां से क्या आया
तेरॊ उंगलियाँ छुपा रही थी
या शायद सहला रही थी
आखों की सतह पे आए मोती
उसी एक पल में
तेरा हाथ
मेरे हाथ तक कैसे आया
बस पता ही न चला
बक्त का बह पल शायद
ग़ुफ़ा के गुम्बद में बंद था

मेरी आंख
तेरी आखों में कैसे उतर गई

शायद किसी पल का भी वकफ़ा नहीं था
मौसम का मिज़ाज एक तरफ़ा नहीं था
तू नदी नहीं थी
मैं पानी कैसे हो गया
तेरे होंठ कुछ कुछ खुले
जुबान शायद ज़रा सा लर्ज़ी
मेरी धड़कन तक आवाज़ आई
प्रेम जैसा कोई लफ्ज़ था या नहीं था
अहसास की इबारत थी

उसी पल दरवज़े पे थी
ताज़ा अतीत की दस्तक 
वक्त के गुम्बद से मै यकायक बाहर था
अपनी हथेली पे
नमी के शिलालेख़ थे
------------
2
मौत की सौगात

मुझे याद से निजात दे
सकूं की एक रात दे
मैं हूं हादसों में जी रहा
मुझे मौत की सौगात दे

बदन में रूप क्या मिला
करूप दिल से हो गया
मुझे रंग भी बेरंग दे
मुझे जात भी कुजात दे

मुझे मंज़िलों का हुलास ना
मुझे रास्तों की प्यास है
लबों को नमीं की चाह नहीं
मेरी रूह को प्रभात दे

इधर भी मैं उधर भी हूं
तुझी का ही मैं घर भी हूं
रहूं पास ही जाना कहां
तू अहद की बस बात दे

मैं टूट कर तो पास था
मैं जीत कर बिख़र गया
मुझी से मुझ को छीन ले
मुझी से मुझ को मात दे
----------


पत्रकार विदुषी ऋतु कलसी के प्रति हम आभारी हैं. जिनकी बदौलत  हमें जोहल साहब जैसे बुजुर्गवार सुगढ़ कवि और उनकी इतनी अच्छी कविता मिली.अनुवाद ऋतु का ही. वह कहती हैं: देविंदर जोहल एक सवेदनशील कवि हैं उनकी कविताएं रिश्तों के नाज़ुक अहसासों को खुबसूरत लफ़्ज़ों में अभिव्यक्त करती हैं
(कवि-परिचय
जन्‍म: 13 अप्रैल १९५७
सृजन: पंजाबी की पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। कविता संकलन के प्रकाशन की तैयारी।
सम्प्रति: आल इंडिया रेडियो जालंधर में प्रोग्राम एग्‍जीक्‍यूटिव पद पर कार्यरत।)




read more...

शनिवार, 5 मई 2012

अरुंधति राय ने दुनिया के सामने बदशक्ल भारत दिखलाया

अच्छा है कि हिंदी में कोई अरुंधति राय नहीं है



















 अजय तिवारी

(सैयद शहरोज़ कमर से संवाद)

डॉ. रामविलास शर्मा जैसे शिखर सामाजिक, सांस्कृतिक और आलोचक का  नवीनतम पाठ प्रस्तुत करने का आपको  श्रेय दिया जाता है।
मुझे ऐसा कोई भ्रम नहीं। जब मैं सन 71 में लेखन साहित्य में सक्रीय हुआ, रामविलास जी आलोचक  के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी, जिस बात को सही समझना उसे निर्भीकता पूर्वक  कहना। इस कारण शुरुआत में वह विवादों के केंद्र  में रहे। लेकिन  आपात्तकाल के  बाद साहित्यकारों की नई पीढ़ी ने डॉ. शर्मा के महत्व को  समझा। तब पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से लाभ उठाने वालों और श्रमिक  जनता से हमदर्दी रखने वालों के  बीच सांस्कृतिक फासला अधिक  उजागर हुआ। इसमें एक पक्ष डॉ. शर्मा विरोधियों का था। शंभूनाथ, रविभूषण, कर्मेंदु शिशिर और प्रगति सक्सेना जैसे  समकालीन आलोचक  उनके महत्व को  स्वीकार करते हैं। अवसरवादी किस्म  के लोग उनके  विरोधी रहे। उनकी स्थापनाओं की मुखालिफत करते रहे। इस प्रसंग को  सामाजक व राजनीतिक  पृष्ठभूमि में देखना व समझना चाहिए।

देश के  कई महत्वपूर्ण कवि लेखको की जन्मशती मनाई जा रही है, लेकिन सिर्फ फोकस अज्ञेय पर ही अधिक क्यों?
अज्ञेय महत्वपूर्ण कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। केशवदास भी महत्वपूर्ण कवि हैं। लेकिन  कबीर, जायसी, तुलसी और केशव में अंतर है। जिनके लिए कबीर व तुलसी महत्वपूर्ण थे, केशव उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं। यही बात अज्ञेय, नागार्जुन व केदार के बारे में समझनी चाहिए। अचानक अज्ञेय को  लेकर बहुत से विचारकों में आत्मग्लानि की भावना जाग उठी है। वे भूल सुधार करते हुए अज्ञेय को अतिरंजित महत्व दे रहे हैं। लेकिन वे नहीं बताते कि भावी जन सांस्कृतिक  विकास में अज्ञेय किस रूप में सहायता करेंगे। समाज को बदलने का लक्ष्य वामपंथी बुद्धिजीवियों के सामने भी नहीं बचा है। इसलिए वे अज्ञेय को  अधिक  महत्व दे रहे हैं। मैं कामना करता हूं कि ये लोग कल नागार्जुन और केदार का नाम लेने में शर्मिंदगी न महसूस करें।

लेखकों व कवियों का दक्षिणपंथियों के मंच पर जाना, उनके हाथों सम्मानित होना, कितना सही है।( सन्दर्भ: मंगलेश डबराल का राकेश सिन्हा के आयोजन में शिरकत और गत वर्ष उदय प्रकाश का कुख्यात सांसद से गोरखपुर में सम्मान लेना.)
स्पष्ट कहूं तो पुरस्कार लेकर अपने विचारों को त्यागना अवसरवाद है। वहीं विरोधी मंच पर जाकर अपनी बात कहना गलत नहीं है।

कहा जाता है कि हिंदी लेखकों का जुडा़व जनता से नहीं है। हिंदी जगत में कोई अरुंधति राय नहीं है।
अच्छा है कि हिंदी में कोई अरुंधति राय नहीं है। उन्होंने यूरोपीय इच्छाओं के अनुकुल भारत की बदशक्ल तस्वीर दुनिया को दिखाई। उन्होंने कहीं न कहीं नक्सलियों का  ही समर्थन किया। मैं नक्सलियों की गतिविधियों को जन आंदोलन नहीं मान सकता। हां यह सही है कि हिंदी लेखक  कवि जमीन से, अपनी जड़ों से कट चुके हैं। जनता से उनका नाता टूट गया है। उनके नजरिये में जनता का हित नहीं है, तो हर बात हवाई होगी। सिर्फ सड़क  पर उतरना ही जनता के  साथ होना नहीं होता। आपकी  रचनाओं में आदिवासी, दलित, स्त्री और आम जन की कितनी पीड़ा और संवेदना है, यह अहम है। भारतीय समाज के हित की बात जहां होगी, मैं उसका समर्थन करूंगा।

इन दिनों कहानियों में भाषायी बत्तंगड़ अधिक देखने को आता है
जब कहानीकार जनता से कटे होंगे, तो वे बाजार का ध्यान आकर्षित करेंगे ही। इसलिए कहानी में विषय वस्तु की जगह वर्णन शैली प्रधान हो जाएगी। आज कहानियों में यह बात सबसे अधिक दिखाई देती है। इसे एक तरह का रीतिवाद समझना चाहिए। यही कारण है कि आरंभिक रचनाओं में ही सारी चमक दिखलाकर ये कहानीकार चुक जाते हैं। फिर ध्यानाकर्षण के लिए और अधिक  चमत्कृत भाषा का प्रयोग कर एक दुश्चक्र में उलझ जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकाँश युवा कथाकारों के यहां ऐसा है। पंकज मित्र, नीलाक्षी सिंह, राजू शर्मा इत्यादि कुछ अच्छे कथाकार भी हैं, जिनके यहां विषय वस्तु मानव संबंधों के अध्ययन से आती है।

मौजूदा समय लेखक संगठनों की भूमिका  किस तरह देखते हैं
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिणपंथी पार्टियों के लेखक संगठन या तो हैं नहीं। और हैं, तो लेखकों में उसकी साख नहीं है। इसलिए लेखक संगठनों की चर्चा वामपंथी पार्टियों के के संदर्भ में होती है। पूंजीवादी संस्थाएं लेखकों  को बहुत से माध्यमों से अपने अनुकुल करती हैं। पुरस्कार, सेमिनार, फेलाशिप, विदेश यात्राएं, सांस्थानिक  सदस्यता आदि। व्यवस्था के बहुत से तरीके हैं। कभी वामपंथी संगठन जन आंदोलनों से लेखकों को जोड़ते थे। यही उनकी शक्ति थी और आकर्षण भी। आज वामपंथी पार्टियां जन आंदोलनों से दूर होकर पूंजीवादी दायरे में सिमट गई हैं। उनके लेखक संगठन भी बुनियादी जिम्मेदारियों से दूर हट गए हैं। जितना पतन वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों का दिखाई देता है, वो निराशाजनक  तो है ही, सांस्कृतिक जीवन के लिए नुकसान देह भी है।

इसका संपादित अंश झारखंड के दैनिक भास्कर के संस्करणों में सम्पादकीय पेज न. १० में ४ मई, २०१२ ko प्रकाशित


read more...

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

झारखंड में हर रोज 10 बेटियां हिंसा की शिकार


10 साल में महिला उत्पीडऩ के करीब  40 हजार मामले हुए दर्ज 
अस्मत से खिलवाड़ 11 हजार बार, वहीं दहेज की  बलि चढ़ीं लगभग 12 हजार, डायन के  बहाने मार दी गईं सबसे अधिक  रांची जिला में 

 





 











सैयद शहरोज क़मर की कलम से
नन्ही सी श्रेया के  नन्हे से सपने ने भी दम तोड़ दिया। दादी सरोज को लोगों ने सफेद कपड़ों से न जाने क्यों लपेट दिया है। उन्हें तो पहली मई को आ रहे उसके  बर्थ डे के  लिए अच्छा सा गिफ्ट लाना था। पापा मम्मी, चाचा सभी रो रहे हैं, लेकिन श्रेया चुप है। उसके  दादा लखन की आंखें बोलती हैं। जिसमें धधकता लावा है। चार हैवानों ने रविवार की  शाम उनकी  पत्नी सरोज को ऑटो से उतारा.सामूहक दुष्कर्म के  बाद उसकी शर्मगाह में शराब की बोतल घुसेड दी.सोमवार की सुबह सरोज ने पुलिस तंत्र की तरह ही आँखें मूँद लीं.  पिछले दिनों मधु देवी का  मासूम बेटा बेतिया में कई दिनों से मां को न पाकर नानी की गोद में सुबक  कर सो गया था। मधु के पति दिल्ली में हैं। कोई छोटा मोटा रोजगार करते हैं। सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर गोड्डा के  एग्जिक्यूटिव इंजीनियर अजय प्रसाद गुप्ता ने उसे रांची बुलाया। रात से खौफनाक  डर उसे दिखाया। उसकी  अस्मत को  तार-तार कर सुबह स्टेशन पर छोड़ दिया।राजधानी से सौ किमी के  फासले पर है नक्सल प्रभावित लातेहार जिला। वहां के  गारू प्रखंड के चोरहा गांव के  कलदेव उरांव की  पत्नी को जबरन घर से उठाकर उसका यौन शोषण किया गया। लेकिन बबीता को  मान के साथ प्राण भी गंवाना पड़ा। वह दिल्ली भगाकर ले जाई गई। उसका  दैहिक  शोषण हुआ। किसी तरह पिंड छुड़ाकर जब वह गुमला के  अपने गांव कोसा बड़का टोली पहुंची तो उसके  गर्भ में बच्चा था। उसे भगाकर ले जाने वाले आरोपियों ने उसके  साथ मारपीट की । उसने दम तोड़ दिया। ऐसी कई कहानियां हैं, जिसका दर्द बाहर भी नहीं आ पाता। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के  आंकड़े के  मुताबिक  वर्ष 2001 से 2010 के  बीच सिर्फ174 आदिवासी और 106 मामले दलित महिलाओं के  साथ बलात्कार के सामने आए। दरअसल यह समाज अधिकाँश अनपढ़ है। थाना कचहरी जाने का साहस नहीं कर पाता। यदि इन आंकड़ों को ही पैमाना मानें तो महिला उत्पीडऩ के 10 साल में करीब 40 हजार मामले दर्ज हुए। औरतों की अस्मत से 11 हजार बार खिलवाड़ हुआ। सबसे ज्यादा गैर आदिवासी इसका ग्रास बनीं। वहीं दहेज की बलि लगभग 30 हजार बेटियां चढ़ीं। डायन के  नाम पर करीब डेढ़ हजार मार दी गईं । इसे मामले में रांची जिला पहले पायदान पर है। डायन का आरोप लगाकर इस जिले में 250 महिलाओं की हत्या कर दी गई।

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े

बलात्कार 7563 सबसे अधिक  2006 में 799

छेड़छाड़ 3374 सबसे अधि· 2003 में 424

यौन उत्पीडऩ 00230 सबसे अधिक 2009 में 83

दहेज हत्या 2707 सबसे अधिक 2009 में 295

दहेज प्रताडऩा 3398 सबसे अधिक 2007 में 453

पति प्रताडऩा 6489 सबसे अधिक 2008 में 851

वेश्यावृति 0075 सबसे अधिक 2007 में 14

बेची गईं 0136 सबसे अधिक 2008 में 39

डायन हत्या 1157 सबसे अधिक 2010 में 35

(स्रोत: 2001 से 2010 से नेशनल क्राइम ब्यूरो)

आयोग तुरंत करता है कार्रवाई

समाज में स्त्री प्रताडऩा की  शिकायतें लगातार मिल रही हैं। इसे अवश्य ही रोका जाना चाहिए। आयोग के पास अगर मामले आते हैं, तो हम तुरंत कार्रवाई करते हैं। कई मामले संबंधित विभाग को भेज देते हैं। उसकी रपट भी हमारे पास आती है।

हेमलता एस. मोहन, अध्यक्ष, झारखंड महिला आयोग

सरकारी तंत्र को गंभीर होने की जरूरत है

पहले हमने खुली हवा में सांस लेने के सपने संजोए। लेकिन  राज्य बनने के बाद घुटन बढ़ी ही। जिनके  जिम्मे सुरक्षा का दायित्व है, वहीं लोग सजग नहीं हैं। जब तक  कि सरकारी तंत्र गंभीर व संवेदनशील नहीं होगा स्त्री हिंसा व प्रताडऩा की शिकायतें कम नहीं होंगी।

दयामनी बारला, सामाजिक  कार्यकर्ता


read more...

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

केरला यानी यहाँ सब अल्लाह की ख़ैर है


समुद्र  नारियल के नमकीन मीठे जल की तरंग 























केरल से लौट कर शहबाज़ अली खान 

 

काफ्का ने अपनी कहानी  'चीन की दीवार' में बीजिंग के बारे में कहा है कि हमारा देश इतना विस्तृत है कि  इसके बारे में कोई भी किस्सा इसके साथ न्याय नहीं कर सकता. यहाँ तक कि इश्वर भी मुश्किल से इसकी पैमाइश कर सकता है. काफ्का ने शायद भारत नहीं देखा होगा वरना वह इश्वर के लिए इस देश की पैमाइश को मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन ही बता देते. ०७ को गाडी मथुरा से खुली. दो एक घंटे बाद ही कुदरती आबशारों से हम नहाते चले गए.कहीं सूरज की किरणें नर्म गिलाफों सा आ-आ कर लिपट जातीं.जिन-जिन राहों से हम गुज़रे अहसास शिद्दत की गिरफ्त में हुआ. हमारा देश कितना विस्तृत है... मध्यप्रदेश में लगातार होरहे खनन, पहाड़ों को काटती पिटती मशीनों और उडती धूलों, चम्बल के बीहड़ों, सामन्ती अवशेषों- मंदिरों और किलों, छतीसगढ़ के नक्सली इलाकों, महारष्ट्र के हरियल और पनियल इलाकों से गुजरते हुए जब गाड़ी कर्णाटक पहुंची तो हवाओं की नमकीन गंध और नारियल की अबोल-मीठ-फ़िज़ा ने दस्तक दे दी.अहा! अब केरल दूर नहीं! सड़कों के किनारे स्वागत करते नारियल के पेड़. उनके झुरमुटों से छन कर आती ठंडी हवाएं रात की स्याही को रौशन करती रहीं.

 
सुबह के साढ़े ५ के करीब हम केरल के कोझिकोडे (कालीकट) पहुंचे. बहार निकलते ही मेरी नज़र सबसे पहले जिस चीज़ पर पड़ी वह मार्क्स के तस्वीर की एक बड़ी सी होर्डिंग थी जिस पर सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की तय्यरियाँ चल रहीं थीं.. भोर के धुंधलके में ही मुझे जंक्शन से लेकर अबू के घर तक हर जगह लाल ही लाल दिखाई दिया.. ये हलब्बी हलब्बी बैनर, होर्डिंग, कटआउट  वगैरह.. रास्ते लाल रंग के फीते हर जगह टंगे नज़र आयें.. दिन का नज़ारा न पूछिए.. अबू ने कहा कि ये अपने को सर्वहारा की पार्टी कहती है लेकिन इस मौके पर २० करोर से ज्यादा खर्च कर चुकी है. हालांकि मैंने इस तथ्य के बाबत कोई छानबीन नहीं की है लेकिन ये तो तय है कि कालीकट को देखकर ऐसा लगा कि मैं भारत के किसी शहर में नहीं बल्कि रूस के किसी शहर में हूँ.

केरल के पहले ही दृश्य ने मोहा मन

सूरज ज़रा ही उपर चढ़ा था कि हम अबू के घर पहुँच गये. अबू हमें अपने घर के आस पास के पेड़ पौधों को दिखाने लगा. काजू के पेड़, गुजराती लोगों का पसंदीदा सुपारी का पेड़, हमारी तरफ चलने वाले सुपारी (तामुल) का पेड़, कटहल, नारियल का तो पूछना ही क्या है, काफी के पेड़ आदि यह सब उसके घर के भीतर और उसके आस पास लगे थे.. फिर अबू हमें अपने घर के पिछवाड़े ले गया और वहाँ जो दृश्य मैंने देखा उसे भूल नहीं सकता. नारंगी सूरज ज़मीन कुछ इंच ऊपर था और उसमें सियाह बादलों की दो तीन धारियाँ कुछ यूँ लिपटी थीं जैसे माँ ने अपने बच्चे को नज़र से बचाने के लिए दो तीन नज़र की टीकाएं लगा दी हों. ज़मीन का गीलापन और काले बादलों में लिपटे सूरज का वह नारंगी रूप आह! क्या कहने उस दृश्य के. केरल ने अपने पहले ही दृश्य से मन मोह लिया... 


























और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया

शाम को समन्दर देखने गये. रास्ते में सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की लहरें अपने उफान पर थीं. इस से बचते बचाते हम वहाँ पहुंचें जिसे देखने की लालसा मेरे दिल में कई सालों से थीं.. जी हाँ मेरे सामने हहराता समन्दर था. २८ साल बाद नंगी आँखों से उसे देखना एक रोमांचकारी क्षण था. पल के लिए मैं डर गया.. इतना भव्य, विशाल, व्याकुल, अंतहीन, लहर दर लहर जोश से भरा हुआ. सब कुछ लीलने को तैयार बैठा हुआ. उस पर अम्मी की हिदायत ... तुम समन्दर के नजदीक मत जाना (उन्हें मालूम है बचपन से पानी से डरता हूँ). मैं अभी उधेड़बुन में ही था कि सारे दोस्त तुरंत पैंट-शैंट चढ़ा के, सैंडिल-जूता एक तरफ कर के घुटनों तक जा पहुंचें. कई छोटे बच्चे कूद-कूद कर उसमें नहा रहे थे. अम्मी की हिदायतों को समन्दर के आकर्षण ने परास्त कर दिया. मुझे याद नहीं, कब मैंने सैंडिल उतारी, पैंट चढ़ाई और उसके पास चला गया. लहरों ने मेरा पैर छुआ. लगा मैं अबोध शिशु हूँ और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया हो! जितनी बार लहर आती मेरे पैरों के नीचे की रेत बहा ले जाती.... एक चुल्लू पानी भी पिया. लगा मानो एक चम्मच भरपूर नमक फांक लिया हो. समन्दर के भीतर नमक न होता तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल था. उस एक घूँट पानी ने मुझे यह अहसास कराया कि दुःख हमारे जीवन का एक ऐसा ही नमक है. जो हमारे जीवन को संतुलित करता है, नियंत्रित करता है. खूब ढेर सारी फोटो खीचा-खिचौअल के बाद आइस अचार का खट्टा-मीठा स्वाद का चटखारा! अब भी उसकी सोंधी डकार बरक़रार है. एक गोरखपुर के पान वाले से मीठा पान खाया. और अँधेरा होते होते वापस अपने कयाम गाह तक लौट आये...






 दुल्हन के घर से आई बरात 


अगले दिन बन-ठन के अबू के निकाह के लिए तैयार हुए.. पता चला कि केरला की एक बड़ी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सैयद हैदर अली शहाब  थंगल अबू का निकाह पढ़ाएंगें. शहाब साहब जब आये तो उनके आगे पीछे कोई और गाड़ी नहीं थी. न ही भीड़-भड़क्का. चूँकि केरल की संस्कृति में सामन्ती अवशेष नहीं के बराबर हैं. वहाँ शादियों में लड़की वाले लड़के वालों के यहाँ आते हैं. वो भी एक दो नहीं पूरे सौ-दो सौ लोग. जितनी तेज़ी से आते हैं उतनी ही तेज़ी से वापस चले जाते हैं. बिलकुल शांत और सुरुचिपूर्ण तरीके से खाना पीना होता है. निकाह के बाद कोई हो-हल्ला नहीं.  बन्दूक-गोलियां नहीं चलती हैं. उनके रहनुमा भी इस संस्कृति का ही पालन करते हैं. सबका पहनावा लगभग एक था- लुंगी और शर्ट और पैर में सैंडिल.  शहाब साहब का भी. चलन इस कदर है कि पैंट पर भी लोग शर्ट इन नहीं करते हैं. ये पहनावा केरल का अपना ही है या वाम विचारधारा का प्रभाव, मुझे पता नहीं चल पाया (पिछले तेरह सालों से एक बड़े कामरेड प्रो. इरफ़ान हबीब को इसी पहनावे को पहनते देखा है, शर्ट बाहर, पैर में सैंडिल या चप्पल, और अभी भी साइकिल से चलना.).. निकाह बेहद सादगी से हुआ, कोई टीम-टाम नहीं, झट-पट. खाना तो खैर माशा अल्लाह था. खाने के बाद गर्म पानी, एक केला, और एक कप काढ़ा. यह सब हम लोगों के लिए बिलकुल नया था. खाने के बाद सभी तुरंत चले गये, लड़की वाले, अबू के रिश्तेदार भी.

वास्को डी गामा के क़दम जब पड़े 

निकाह बाद बचे सिर्फ हम लोग. फिर तय पाया गया कि हमें कापड बीच देखना चाहिए जहां पहली बार वास्को डी गामा के पैर पड़े थे. अँधेरा होने से थोड़ी ही देर पहले पहुंचे. यहाँ के चट्टान और समंदर, दोनों ही गवाही दे रहे थे कि कभी यहाँ दुनिया आकर मिलती रही होगी. हालांकि इन चट्टानों पर  सी.पी.आई. एम् के इश्तेहार दूर से ही नुमाया हो रहे थे. वास्को कभी यहाँ आया था उसकी कोई इबारत नहीं देखी. सिर्फ एक समंदर था जो यह चीख चीख कर कह रहा था कि मेरे सीने पर वास्को ने कभी नाव चला कर इस सर ज़मीन पर अपने पैर रखे थे. चट्टानों से गले मिलने को बेताब समंदर का जोर देखने लायक था. लेकिन बेदिल चट्टान हर बार उसकी बेताबी को झुठलाकर उसे वापस कर देता था. समंदर की बेताब लहरें आपस में खूब टकराती हैं लेकिन ऐसा लगता मानो कभी मिल नहीं पाती. हमारे दो दोस्तों ने सूरे रहमान की उस आयत का ज़िक्र किया जिसमें कहा गया है कि समंदर जब मिल रहे होते हैं तो उनके बीच में एक पर्दादारी होती है, जिसका वह अतिक्रमण नहीं कर पाते. सच aisa  hi लगा. सूरज जल-समाधि  के लिए अधीर हो रहा था. आध घंटे में उसने जब समाधि ली तो शोर कुछ थम सा गया. बारिश की आशंका ने भी हमें वहाँ से वापस होने पर मजबूर कर दिया.










 


















वाय्नार्ड के जंगलों में इतिहास का सूरज

 दो दिन समन्दरों के हहराते शोर और चंचल लहरों को देखने में गुज़रे. अगले दिन यह तय पाया कि अब हम कोझिकोडे से लगभग २०-३० किमी दूर वाय्नार्ड चलते हैं. वाय्नार्ड कर्नाटक और केरल को जोड़ता है. ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच से टीपू सुल्तान ने यह रास्ता खोजा था.  (कुछ का मानना है कि टीपू ने नहीं बल्कि हैदर अली ने इस रास्ते की खोज की थी) इन दोनों बाप-बेटों में से जिसने भी इस रास्ते की खोज की हो, इस रास्ते को देख कर मैं अपने देश के शासकों के सराहनीय योगदानों के प्रति अभिभूत हो गया. इस रास्ते पर चलते हुए दोस्तों ने शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित भारतीय सड़क व्यवस्था की भी चर्चा की. इन चर्चाओं के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि आखिर किस बात पर हम अंग्रेजों द्वारा माल्गोदामी व्यवस्था की सराहना करते हैं? किस आधार पर उन्होंने  यह कह दिया कि हमारा पिछला शासन अविकसित था. अगर कोई हिंदुस्तान को गौर से देखे तो उनकी बातें झूठी साबित हो जायेंगी. वाय्नार्द चारो और से पहाड़ों से घिरा है. यूँ ट्रेन के सफ़र में भागते पहाड़ों को देखा तो था लेकिन इतने नज़दीक से .. ओह् ह्ह इतना उदात्त, गंभीर, अविचल, मौन था कि उसको देख के कुछ सूझ ही न रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि यह समाधि में बैठा को कोई साधू है या आँखें तरेरता हुआ कोई दबंग है. . या ज़मीन में धंसी कोई कील है जिसने ज़मीन को पकड़ रखा है.(एक दोस्त ने बताया कि अल्लाह कुरआन  में पहाड़ों के बारे में कहता है कि हमने इसे कील की तरह ज़मीन में ठोंक दिया है.. ताकि ज़मीन हिल न सके) पहाड़ों को देख के न जाने दिल में क्या-क्या आया वह बता पाना मुश्किल है, कितने कवियों की पहाड़ पर लिखी कवितायें याद आयीं. लेकिन  "तुझको देखूं की तुझसे बात करूँ" वाली स्थिति मेरी थी. 



























पहाड़ के आह से उपजी नदी

वाय्नार्द के जंगलों के आस पास बसी आदिवासियों की बस्ती उतनी ही खुबसूरत सुरम्य. वहां की एक झील का आनंद लेने के बाद हमने कुरुवा द्वीप में फिसलन भरे पत्थरों और चट्टानों के बीच कल-कल बहते नीर के साथ थोड़ी सी मस्ती की. उससे थोड़ी दूर पूकोट्टू झील के पास पहुंचे जो भारत के नक्शे की तरह बसा था...हमने यहाँ बोटिंग की. बोटिंग कराने वाले ने हमें उस झील की गहराई और उससे जुड़े कुछ और तथ्यों के बाबत जानकारी दी. उसने हम लोगों की तस्वीर भी खींची. केरल वासी सौम्य और सुलझे तथा कितने सभ्य हैं उस एक आदमी से बात करके यह बात और भी पुख्ता होगयी. लौटते वक्त ट्रेन में पैंट्री कार के एक वेंडर ने मोहम्मद जलाल या जमाल, जो की सीलनपुर का था, ने भी इस की तस्दीक की. पूकोट्टू में हमने लकड़ी से बने कुछ सामान खरीदे. और लौट पड़े. शाम अब बेहद गहरा गयी थी. चारो और एक धुंध सी थी. पहाड़ धुएं से लिपटे हुए थें. तब मेरे ज़ेहन में यह आया कि पहाड़ साधू या हो दबंग हो, असल वह एक वियोगी है. एक दुःख से भरा प्रेमी है.  जैसे-जैसे रात होती है, उसका दिल जलता है, इक धुंआ-सा उठता है.... इतना धुंआ उठता है कि दूर से देखने पर लगता है नदी बह रही हो. यह पहाड़ के आह से उपजी नदी थी जो सिर्फ रात के अँधेरे में ही बहा करती है. 
































रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना

केरल का हमारा प्रवास चौथे दिन अपनी समाप्ति की ओर आ गया. अबू के घर मिली इतनी मोहब्बत और स्नेह हम भूल नहीं सकते. हमारे और अबू के घर वालों के बीच भाषा की दीवार थी. हमारे एक मित्र हफीज ने इस दीवार को गिरा दिया था. वह कर्नाटक के मैंगलूर के वासी हैं, केरल में शिक्षा प्राप्त की है, अभी अलीगढ से अरबिक से पीएच. डी कर रहे हैं. ६ भाषाओँ के जानकार हैं. उन्होनें ट्रांसलेटर की भूमिका बहुत शानदार ढंग से निभायी. उनके बिना टूर अधूरा होता. यूँ तो हर दोस्त अपने में ख़ास था लेकिन उनका महत्त्व रेखांकित करने योग्य है... जाने से पहले मैंने कहा था कि यूँ तो केरल के टूर पर जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. लेकिन मेरे लिए एक केरलवासी दोस्त अबू की शादी में शिरकत करना बहुत अहमियत रखता है. मेरे लिए यह उस हिन्दुस्तानी तहजीब की बेमिसाल रिवायतों में से एक है कि यहाँ तमाम तहजीबों के बीच एक रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना होता है. यह धागा तोड़े से भी नहीं टूटता है. दूरियों को ये एक क़दम में नाप लेता है. अजनबियत को चुटकी में बाँध कर किसी दरिया में डाल देता है. और यह धागा किसी दुकान पर नहीं, बल्कि हमारे दिलों में मिलता है. हिन्दुस्तान इसी मायने में अपने भीतर हमेशा जिंदा रहता है....






 
























वहां से आते वक्त दिल में बस इतना ही कहा कि वाकई यहाँ सब अल्लाह की खैर है.*

*केरला के नामकरण एक पीछे एक कारण यह बताया जाता है की जब पहली बार अरब यहाँ पहुंचें तो उन्होंने इसकी खुश हाली देख कर कहा था कि यहाँ खैरुलाह! यानी सब अल्लाह की खैर है....खैरुलाह बाद में घिसट कर केरला हो गया.

(लेखक-परिचय:
जन्म: १८ मई, १९८४, बहराइच में
शिक्षा: अलीगढ मुस्लिम विवि से राही मासूम राजा पर पी-एच डी कर रहे हैं
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट. फेसबुक के चहीते रचनाकार
संपर्क:alikhan.shahbaz@gmail.com)


हमज़बान पर उनकी पहली पोस्ट
शहरयार की याद पढ़ें 


 
read more...

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

अपने अंदर का प्रेम बचा लो तो पृथ्वी बच जाएगी



{दामुल और मृत्युदंड जैसी कई फिल्मों के लेखक और हिंदी के अनूठे रचनाकार शैवाल का मानना है कि आज की सबसे बड़ी खबर है नैतिकता बोध का खत्म हो जाना। अब हर आदमी अपने लिए जी रहा है। शैवाल पिछले दिनों रांची में थे। समाज, साहित्य और फिल्म पर शहरोज ने विस्तृत गुफ्तगु की। पेश है उसका संपादित अंश : यह भास्कर के अंक में प्रकाशित हुई.}

आदमखोर विकास का  समय 
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
शैवाल


हर सरकार आजकल विकास का ढींढोरा पीटती है
इन दस सालों में सभ्यता, संस्कृति और मनुष्यों के बीच कोई तारतम्य नहीं है। उनका आपसी लयात्मक सूत्र बदला है। जब लय टूटती है, तो विकास आदमखोर हो जाता है। यह समय उसी आदमखोर विकास का है। गांव का किसान बेटा रामप्रसाद मेहनत कर इंजीनियर बनता है। उसके बाद पैसा कमाते हुए महज 35 वर्ष की आयु में मर जाता है। एक ही मकसद धन संचय। उसके ढंग कैसे भी हों। नैतिकता स्वाहा। यही आदमखोर विकास है।
 
दामुल से मृत्युदंड तक कई मोर्चे पर आप प्रकाश झा साथ रहे। नाता टूटा कैसे? फिल्मों का लेकर उनके मिजाज में बदलाव आया। जबकि मैं सामाजिक सरोकारों से जुड़ी फिल्में लिखना चाहता हूं। फिल्मों का आपसी नाता जरूर ठहर गया है, लेकिन रिश्तों में वही मिठास है, जो कल थी। व्यक्तिगत संबंध और सामाजिक सरोकार दो अलग चीजें हैं। इसे एक दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

नई फिल्म दास कैपीटल के बारे में कुछ
शाश्वत प्रश्नों को लेकर लिखी गई कहानियां सार्वकालिक महत्व की होती हैं। मेरी दो कहानी अकुअन का कोट और अर्थतंत्र पर आधारित फिल्म है दास कैपीटल। यह मार्क्स  वाली नहीं है। इसका मतलब है गुलामों की राजधानी। नेट सर्फिंग के दौर में दुनिया के सिमट जाने की बात जरूर की जा रही है। जबकि वैश्विक संवेदनाओं का अकाल पैदा हुआ है। संबंध अर्थहीन हो रहे हैं। मध्यवर्गीय जीवन पर पूंजीतंत्र का दबाव बढ़ा है। इसी व्यवस्था ने कंकाल तंत्र विकसित किया है। यह सिस्टम आदमी को आखिरी किनारे पर ले जाकर मार देता है, फिर उसे कंकाल में रूपांतरित कर बेचता है। सवाल है कि समुदाय का जीवन बचेगा कैसे। फिल्म जवाब देती है कि अपने अंदर का प्रेम बचा लो पृथ्वी बच जाएगी।

आपके साथ और कौन कौन लोग हैं
इसकी स्क्रिप्ट में मेरे एमबीएधारी बेटा शुभंकर ने सहलेखन किया है। गोविंद निहलानी के भाई दयाल निहलानी ने इसका निर्देशन किया है, वहीं पत्रकार मुक्तिनाथ उपाध्याय इसके प्रोड्यूसर हैं। राजपाल यादव, केके रैना, यशपाल शर्मा, प्रतिभा और मनोज मेहता आदि ने अभिनय पक्ष संभाला है। इसे कांस फिल्म फेस्टीवल में भेजा गया है।

फिल्मों में आई नई पीढ़ी को किस तरह देखते हैं
नई पीढ़ी नए ढंग से चीजों को देख रही है। युवा अच्छा कर रहे हैं। अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया जैसे लोगों की फिल्में बहुत उम्दा हैं। ऐसा कहना गलत है कि युवा पीढ़ी पूरी तरह सरोकारों से दूर जा रही है।

संस्कृति संरक्षण में समकालीन लेखक का कितना योगदान है
आजकल संस्कृति संरक्षण के लिए लेखक इमारत बनवाता है। मठ बना लेता है। जबकि बाबा नागार्जुन को इसकी जरूरत नहीं पड़ी। वो थैला उठाए भारत भ्रमण के लिए निकल जाते थे। लेकिन अपवाद हर कहीं है। आज भी कुछ लोग जमीनी स्तर पर भी काम कर रहे हैं।

इन दिनों आलोचकों की सनद के लिए होड़ है
मेरी चाह कभी नहीं रही कि उनके पथ पर लोट जाऊं। उनसे कभी मिला तक नहीं। संपादकों से भी याराना संबंध नहीं बन पाया। पहले रविवार, धर्मयुग और अब हंस आदि पत्रिकाओं में जबदरदस्ती छपता रहा।

आपकी अपनी प्रिय कहानी
नाचीज शहर की गली है जहां फुकनबाबू की प्रेमीका रहती है। यह कहानी संभवत 1997 के आसपास हंस में छपी थी।

आपका इधर उपन्यास नहीं आया
पांच उपन्यास पर रह रह कर काम कर रहा हूं। चारित्रिक स्थितियों से संतुष्ट नहीं हूं। दशकभर भर बाद स्थितियां बदल जाती हैं। यथार्थ स्थितियों का व्यंग्यात्मक चित्रण करने की कोशिश करता हूं। दोनों समानांतर चलते हैं।

कविता कहां छूट गई
शुरुआत मेरी भी कविता से ही हुई। लेकिन संकलन प्रकाशन की हिम्मत नहीं हुई। अब कहानी में ही कविताई होती है। कविता से शुरू हुआ सफर कहानी, संपादन, पत्रकारिता होकर फिल्म तक पहुंचा है।

भारतीय फिल्मों में गांव कहां पाते हैं
अब फिल्मों से गांव लुप्त होते जा रहे हैं। पीपली लाइव की खूब चर्चा हुई। किसानों के दर्द की बात की गई। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। यह फिल्म किसानों का मजाक उड़ाती है। किसानों के दर्द व आंसू के गारे पर ऐसी इमारत खड़ी गई, जिसे अच्छे दामों पर बेचा जा सके। ग्राम्य जीवन स्थितियां उद्वेलित करती हैं। परेशान करती हैं। मखौल तो उसका हरगिज नहीं उड़ाया जा सकता।

भोजपुरी फिल्मों में तो गांव दिखता है
हां। दिखता है। यह फिल्मी गांव है। पहले की फिल्मों में गांव का सोंधापन होता था। अब फूहड़ संवाद और गीत संगीत से संस्कृति का निर्माण तो नहीं होता। भोजपुरी फिल्में हिंदी मसाला फिल्मों की नकल बन कर रह गई हैं। गांव के लोगों की समस्या वहां से गायब हैं। मल्टीप्लेक्स और भोजपुरी के बीच ऐसा सिनेमा होना चाहिए, जो आम लोगों का हो।

दामुल का लेखक आज गांव को किसी तरह देखता है
हालात में बहुत ज्यादा तब्दीली नहीं आई है। समस्याएं अब अधिक विकराल रूप में मौजूद हैं। महज किरदार के बदल जाने से फिजा नहीं बदल जाती। शोषण भी है। जातीय दंभ में इजाफा हुआ है। राजनीतिक चेतना आई तो है, लेकिन चुनाव में पैसा-खेल बढ़ा भी। सामंतवाद की शक्ल भर बदली है।



read more...

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

ओ रंगरेज़िये ! मेरा रंग दे बासंती चोला..


रंगरेज़ा, रंग मेरा मन, मेरा तन



 
 










 ममता व्यास की कलम से 


कल बाजार से गुजरते समय इक़ रंगरेज की दुकान पे नजर पड़ी | वो बड़े जतन से , हर कपड़े को रंग रहा था | बड़ी ही तन्मयता के साथ | हर कपड़े को उठा -उठा कर रंग में भिगो देना | फिर उसे सुखाने के लिए इक़ रस्सी पर लटका देना | लाल, नीले, हरे पीले, गुलाबी और जामुनी भी तो | सभी रंग कितने अच्छे और कितने कच्चे ....| ज़रा लापरवाही हुई नहीं कि इक़ का रंग दूजे पर चढ़ जाए | वो रंगरेज , अपने काम से थक के ज़रा आराम करने की नियत से लेट गया | और मैं चल दी | लेकिन तभी मैंने उस दुकान में कुछ आवाज़े सुनी | सभी , साड़ियाँ, दुपट्टे , और बहुत से कपड़े इक़  जगह  आकर इकट्ठे होकर बतिया रहे थे | मैं ठहर गयी तो सुना -- ---इक़ गुलाबी दुपट्टे ने बात शुरू की | इस रंगरेज से मैं बहुत परेशान हूँ | ये अपनी मर्जी से हमें क्यों रंग देता है ? मुझे गुलाबी, नहीं लाल रंग पसंद है | फिर इसने मुझे ये फीका गुलाबी रंग क्यों दिया ? जबकी मैं चटक लाल  हो जाना चाहता हूँ |  और वो देखो, देखो काली  साड़ी कितनी उदास है.  उसे हरा पसंद था | मेरा बस चले तो इक़ दिन इस रंगरेज की दुकान ही बंद करवा दूँ | 
अब तुम चुप हो जाओ | इक़ सफ़ेद कपड़ों की गठरी बोली | ये रंगरेज , इतना बुरा भी नहीं | अब मुझे देखो मैं कितनी बुरी लगती हूँ | रंगहीन | कल ये मुझे इक़ नए रंग में रंग देगा | फिर मैं बाजार में चली जाउगी | वहां मुझे खरीद के लोग अपनी मनपसंद ड्रेस बनवायेंगे | मेरा उपयोग होगा | दुनिया देखूंगी मैं | यहाँ घुट के मरने से बेहतर है, दुकान से बाहर चले जाना | ये रंगरेज ना हो तो क्या मोल है हमारा ? बोलो ? 
तभी, खूंटी पर सुखाने के लिए लटकाई गयी इक़ साड़ी बोली: इस रंगरेज को इतनी भी खबर नहीं कि  मैं कबसे इस खूंटी पर टंगी हुई हूँ | मेरी बारी कब आएगी कि  मैं हवा में खुल कर बिखर जाऊं ? उड़ जाऊं | तभी इक़ दर्द भरी आह निकली --और मुझे देखो मैं कबसे इस रंग के बर्तन में भीग रहा हूँ | मुझे बाहर नहीं निकालता वो रंगरेज | मैं दर्द से मर गया हूँ |  ये कितना निष्ठुर रंगरेज है | इसे किसी की कोई परवाह नहीं | ये बहरा है | जरुर ये कोई नशा करके सो जाता है रोज |और हमारी बात , जो हम कह नहीं सकते इससे | क्या , ये कभी समझ पायेगा ? 
मैं सोचने लगी | हम सब भी तो मात्र इक़  कोरे कपड़े ही हैं | ऊपर बैठा वो रंगरेज हमें जैसे चाहे रंग दे | उसके रंग कितने अच्छे कितने सच्चे | वो हम सभी को अलग -अलग रंगों में रंगता है | हम सभी , इक़ दूजे से कितने अलग | कोई किसी से मेल नहीं खाता | चेहरे अलग | फ़ितरत अलग | आवाज अलग | अंदाज अलग | किसी का रंग किसी से नहीं मिलता | किसी का ढंग किसी से नहीं मिलता | सभी विशेष | सभी अनोखे | क्या खूब बनाया | 
किसी के भीतर लोहा भर दिया | किसी के अन्दर मोम भर दिया | जो लोहा भर दिया तो वो मशीनी आदमी हो गया | अब वो मशीन की तरह काम करता है | मशीन की तरह प्रेम करता है | उसका दिल लोहे का जो टूटता नहीं | दर्द उसको होता नहीं | वो सिर्फ मशीनी है | उसकी देह भी इक़ मशीन हो गयी | वो कभी मोम नहीं हो सकता | और जो किसी में मोम भर दिया तो वो पल पल पिघलता ही रहता है | जहाँ ज़रा सी प्रेम की उष्मा मिली | पिघल गए | गर्मी ज्यादा मिली तो पिघल के शक्ल ही बदल बैठे | मोम  को शिकायत की ये लोहा उसकी कोमलता को नहीं समझता | इक़ झटके में उसे चूर -चूर कर देता है | लोहा , कहता है मोम का कोई केरेक्टर ही नहीं जब देखो पिघल गए | 
उस रंगरेज , ने किसी में खुश्बू भर दी तो वो जहाँ होता है अपनी महक भर देता है | तो किसी में बंजर कर देने के रसायन भर दिए | ऐसे जहर भर दिए की वो मनुष्य अपने जहरीले रसायनों से ना जाने कितने दिलो की धरती को हिरोशिमा नागासाकी बना बैठे | किसी में इतनी  उर्वरा शक्ति भर दी की उसने रेगिस्तानो में झरने बहा दिए | फूल खिला दिए | किसी में इतने शब्द भर दिए की शब्दों की क्यारियाँ बाना दी | | तो किसी के पास इक़ शब्द भी नहीं कहने के लिए | किसी में हरापन भर दिया तो किसी में वीराना | कोई अपने शब्दों से किसी के भीतर सृजन कर दे | कोई अपने शब्दों के तीर से किसी को बाँझ कर दे | कोई गौतम ऋषि अपने शब्दों से स्त्री को पत्थर बना दे | तो कोई राम उसे अपने स्पर्श से फिर स्त्री बना दे | 
कमाल का है वो रंगरेजा | उसे सब खबर है | किस को कहाँ जाना है | किसकी कहाँ मंजिल है | किसके भाग्य में कितने कांटे है | कितना हिस्सा ? कितना किस्सा ? कितनाकौन झूठा | कौन  कितना सच्चा | किसकी रेट कितनी बंजर होगीं | किसकी आखों में कितने रतजगे उसने लिखे वो ही जानता है | 
दर्द के समन्दरो में किसको कितना डुबाना है | किसको सावन में कितना जलाना है | किस को किस खूंटी पर उमर पर बांध के लटकाना है | किस को बाँध कर मोड़ कर कोने में रख देना है | कितने , रंग उसके पास | कितने ढंग उसके पास | कैसा संग उसका ? कैसा चलन उसका ? कौन जाने ? कितना जाने ? हाँ सभी कोरे कपड़े की गठरियाँ है | कब किसकी बारी आये वही जाने | हम जिस रंग के है उस रंग का कोई दूजा क्यों नहीं मिलता ? हम जिस ढंग के हैं वैसा कोई और क्यों नहीं दिखता ?  इस ऊपर बैठे रंगरेज से हम सभी इतने नाराज क्यों ? फिर भी उससे मिलने की आस क्यों ? वो दिखता नहीं फिर भी आसपास क्यों ? 
ओ , रंगरेज ..सुनो ना ...तुम खूब हो | तुम्हारे रंग भी बड़े खूब हैं | लेकिन ये बताओ क्या कभी कोई रंग तुम पर भी किसी का कोई रंग चढ़ा है ? तुम कभी किसी के रंग में रंगे हो ? क्या कभी तुम्हारे भीतर किसी का कोई रंग बहता है ? चलो मत बताओ ये तो बताओ की हम तुम्हे तुम्हारे इस मेहनताने की क्या कीमत दे ? क्या रंगाई है तुम्हारी ? 
जो , हम पर अपना रंग चढ़ा दे | जो हमें इक़ नए रूप में बदल दे | उस रंगरेज को कोई क्या दे भला ? देह हो या मन | दोनों तुम्हारी रचना | | इनमे से तुम जो चाहे वो ले सकते हो | या तो मन ? या देह ? या दोनों ? ये फैसला रंगरेज खुद करे | इक़ गीत की पंक्तियाँ हैं : रंगरेजा, रंग मेरा मन, मेरा तन | ये ले रंगाई चाहे मन ? चाहे तन.
 
समीक्षक की राय:शहबाज़ अली खान
रंगों के माध्यम से ममता जी ने आदमी के मुक़द्दर को जिस तरह से परिभाषित किया है वह बहुत ही खुबसूरत है, और मार्मिक भी .. हर रंग का अपना मुक़द्दर है. बल्कि हर चीज़ की अपनी नियति है.. बर्फ की नियति है पानी में जाकर मिल जाना.. आदमी की नियति है कि वो आज़ाद नहीं है... उसके पैरों में एक बेडी है जो अदृश्य है..लेकिन बेहद शक्तिशाली है....ग़ालिब कहते है : "नक्शे फरयादी है किस की शोखिये तहरीर का/ कागज़ी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का" तो इक़बाल कहते है कि "तेरे आज़ाद बन्दों की, न ये दुनिया न वो दुनिया/ यहाँ मरने की पाबन्दी, वहां जीने की पाबन्दी".... इस रंगरेज़ से लोग इसी चीज़ की शिकायत करते है कि  किसी को मोम बनाया, तो किसी को लोहा बना दिया.. मोम तुरंत बहने लगता है.. लोहा पिघलना तो दूर झुकता भी नहीं है.. इस रंगरेज ने किसी को बहार बख्शी तो किसी को बंजर ज़मीन दी.. किसी को दरया दिया  तो किसी को ओस की दो बूंद.... जो मिला उसको सहर्ष स्वीकार कर लेना.. और जीवन पूरी उत्फुल्लता से जीना.यही रंगरेज़ की खुश रंगत है.



(लेखक-परिचय:

जन्म: 31 जनवरी
शिक्षा:मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म , ऍम ए-क्लिनिकल साइकोलोजी |
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट लेखन-प्रकाशन
सम्प्रति: कुछ अखबारों में सम्बद्ध रहने के बाद स्वतंत्र लेखन
आत्म-कथ्य: मैं बहुत ही साधारण और  सामान्य हूँ | दिखावे से दूर | लिखने के कोई नियम और कानून नहीं मेरे पास | ना भारीभरकम शब्द और ना बात | ना कोई सामाजिक संदेश ना राजनीति | जो महसूस करता है मन | वही लिख देती हूँ |
सम्पर्क : कोटरा सुल्तानाबाद, भोपाल

 ब्लॉग : मनवा   )

read more...

मंगलवार, 21 फरवरी 2012

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष : उर्दू-हिन्दी-बांग्ला-पंजाबी के मार्फ़त

                                                                                               चित्र:गूगल से साभार



उर्दू: जहरीला तिलिस्म-हसीं ख़्वाब 



















शमशाद इलाही शम्स की कलम से




उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत पसंद की जाने वाली जुबानों में से एक है जिसका अभुदय भारत में मुस्लिम शासन के लगभग ८०० सालों की हकुमत के दौरान हुआ, मुस्लिम हकुमत के अंतिम १००-१५० सालों में (१८०० के आते आते और उसके बाद) इसका प्रचार प्रसार लेखन में अभिव्यक्ति के बतौर इतिहास में दर्ज किया जाने लगा. मुस्लिम हकुमत के दौरान मध्य एशिया के विभिन्न देशों से आये सैनिकों जिनमें तुर्क, मंगोल, इरान और अरब के सैनिकों की संख्या अधिक थी, इन्हीं अहम नस्लों की फ़ौजी छावनी में एक मिश्रित भाषा अपने सहज-मानवीय व्यवहार के दौरान बनी जिसका नाम उर्दू है. उर्दू ज़ुबान को छावनी से निकल कर महल और सत्ता के गलियारों से संबंध रखने वाले समाजी तबके में अपना असर महसूस कराने में काफ़ी वक्त भी लगा और मेहनत भी. ज़ाहिर है मुग़लिया हकुमत के दौरान फ़ारसी ही राज्य भाषा थी जिसके समानान्तर या यूं कहें कि इसकी छत्रछाया में उर्दू ने अपने पैरों पर चलना सीखा. यह कहना ऐतिहासिक रुप से सच नहीं होगा कि उर्दू शुद्ध रुप से भारतीय भाषा है या इसका मुसलमानों से कोई वास्ता नहीं. यह भाषा शुद्ध रुप से भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के आगमन के पश्चयात ही विकसित हुई जिसमें कालान्तर में देवनागरी के शब्दों का प्रचलन-संमिश्रण भी वैसे-वैसे बढ़ा जैसे-जैसे इसका असर और रसूख समाज के दूसरे इदारों में बढ़ा और इसे समाजिक स्वीकृति मिली.

छावनी में हुआ उर्दू का फ़ैलाव
ज़ाहिर है, उर्दू का विकास क्योंकि छावनी में हुआ और उसका फ़ैलाव सत्ता से जुडे सामाजिक तबके में ही हुआ लिहाज़ा यह जन भाषा कभी नहीं बन सकी. राजा के दरबार में साहित्य, काव्य अथवा राजा से जुडे उसके मनसबदार, नवाब, सूबेदार, फ़ौज के अफ़सर, शासन चलाने वाले हाकिम, मालगुज़ारी वसूलने वाले और ज़मीनदारों के बीच ही इसका प्रचलन बढा. सामंती समाज में इसी तबके के पास पढ़ने लिखने, काव्य और मौसिकी के लिये वक्त था तब इनके मानसिक मनोरंजन या विलासिता के लिये जिस बाज़ार का निर्माण तत्कालीन समाज में हुआ उसे उर्दू से पूरा किया. जाहिर है इस तबके को स्थानीय भाषा अथवा उसके कवियों से उस सुख की अनुभूति स्वभाविक रूप से नहीं मिल सकती थी जिनका खून उन्हें चूसना था...जिनसे उन्हें लगान वसूलना था या जिन पर उन्हें शासन करना था. भला ब्रज भाषा, भोजपुरी, अवधि, खड़ी बोली में उनकी सत्ता के मद का रस भला कैसे व्यक्त किया जा सकता था? स्थानीय भाषाओं का दर्द उनके वर्गीय चरित्र के अनुरूप था जबकि मलाईदार सामंती-कुलीन तबकों को अपनी मानसिक संतुष्टी (ऐय्याशी) के लिये जिस सुरमई फ़ाहे की जरुरत थी, वह रुहानी फ़ाहा फ़राहम कराने का काम उर्दू भाषा ने पूरा किया, इसके मिठास पर चर्चा करने वाले, उस पर रात-दिन एक करने वाले अदीब भारतीय इतिहास के इस करुणामय तथ्य को भूल जाते हैं कि आम जनता के लिये उस कठिन समय में इस मिठास का लुत्फ़ लेने वालों के हाथ कोहनियों तक और पैर घुटनों तक खून में रंगें हैं. ज़मीन पर विदेशी हुकमरानों का कब्ज़ा हुआ था, जिनकी
ज़मीनें थी वही देशज भाषी जोतदार-गुलाम बनें और उर्दू बोलने वाले उनके राजा, हाकिम- लगान वसूलने वाले बने. निसंदेह उर्दू का इतिहास बताने वाले इस भाषा के कुलीन-सामंती चरित्र पर हमला किये बगैर ही इसका महिमामंडन यदि करते हैं तब उनके वर्गीय चरित्र का मूल्यांकन करना जरुरी होगा. दूसरी एक वजह, इस भाषा का मुसलमानों से संबंधित होने के कारण इसके राजनैतिक रुप से संवेदनशील होना भी है जिसके चलते इस भाषा के वर्गीय चरित्र पर ऐतिहासिक मीमांसा ऐसे नहीं हुई जैसी होनी चाहिये थी. इतिहास के किसी क्रम और उससे जुडे़ अनाचार को भुलाकर किसी भाषा की समीक्षा करना न केवल एकांगी कृत्य होगा वरन यह इतिहास के साथ निर्मम धोखाधड़ी भी होगी. भारत के संदर्भ में यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है, संस्कृत, पाली, अवधि, ब्रज, तामिल, तेलगू आदि से लेकर उर्दू तक हमें इन भाषाओं के वर्गीय चरित्र और इनके सामाजिक आधार की समीक्षा जरुर करनी होगी तभी हम किसी न्यायसंगत नतीजे पर पहुँचा सकते हैं.


सामंती चरित्र की विशेषतायें
सामंती चरित्र की विशेषतायें विलक्षण हैं, सामंत अपना घर, अपनी बैठक, खेत खलिहान, पेड़ पौधे, खाना-पीना, कपडे, तलवार, हत्यार, बैंत, जूती, धर्म, संस्कार, तौर-तरीके, मूंछ का बाल, यहां तक की नाई-धोबी-लोहार-दर्जी आदि पर ही न केवल अपनी दबंगई छाप छोड़ता है बल्कि उससे भी अधिक उसे अपनी भाषा पर घमंड होता है. सामंती सोच की इस कमजोरी को, या यूं कहें कि इस लक्षण को उर्दू ने बखूबी अपने काम में लगाया. इस भाषा ने, न केवल भारत के सामंती तबके की वैचारिक नज़ाकत को प्रश्रय दिया बल्कि इस वर्ग के साथ खुद को जोड़ कर अपनी विशिष्टता बनाये रखने में भी कामयाब हुई. नवाब-सामंत-हाकिम भी इससे संतुष्ट था कि उसकी ज़ुबान की नज़ाकत सिर्फ़ उसे ही समझ में आती है. आम कामगार, खेत मज़दूर अथवा श्रमिक उसकी भाषा से अनभिज्ञय है, इससे उसके व्यक्तिगत दंभ को भी बल मिलता. यह दंभ दोनों को एक दूसरे की हिफ़ाज़त करने में मददगार साबित हुआ, लिहाज़ा उर्दू भारत के मुस्लिम शासक वर्ग की ज़ुबान बन गयी जबकि ज़मीनी स्तर पर जनता की ज़ुबान इलाकाई भाषायें ही रही, लेकिन मुसलमान शासक वर्ग दिल्ली, कलकत्ता, मैसूर, हैदराबाद जैसे दूरस्थ स्थानों पर भी एक ही ज़ुबान मज़बूती से बोलता दिखा.


आजादी की जंग में उर्दू पहुंची लोक में

भारत पर अंग्रेज हकुमत के दौरान और उससे निजात पाने की जुस्तजु यानि आज़ादी की लडाई के दौरान उर्दू के सामंती चरित्र पर थोड़ी चोट लगी. आज़ादी की लडाई लड़ रहे सैनानियों जिसमें मुसलमान तबका भी शामिल था; अब आम जनता से बातचीत करने को तैयार दिखा, लिहाजा उर्दू की किताबें, इश्तहार और देशभक्ति के तरानों के माध्यम से उर्दू किसी हद तक आम जनता के घरों में आ पहुंची. हिंदी- हिन्दु- हिन्दुस्तान जैसे नारे का चलन १९२०-३० की दहाई से शुरु हो जाने के कारण उर्दू को मुस्लिम और हिन्दी को हिन्दू जैसे सख़्त लबादे ओढ़ने पर मजबूर होना ही था. धर्म के आधार पर जंगे आज़ादी की लडाई जब तकसीम हुई तब उर्दू को मुकम्मिल तौर पर मुसलमानों के आंगन तक ही सिकुडना था जोकि तर्कसंगत भी था. दार्शनिक, लेखक, कवि इकबाल ने मुसलमानों को एक मुक्कमिल राष्ट्र की अवधारणा के रूप में व्याखित कर ही दिया था, मौहम्मद अली जिन्नाह ने इसी आधार पर द्विराष्ट्र सिद्धांत की रचना की और एक स्वतंत्र मुसलमान राज्य की स्थापना करने में जुट भी गये,
१९४४ में गांधी को लिखे एक पत्र में जिन्ना ने खुद को मुसलमानों का एकमात्र नेता मानते हुए कुछ यूं कहा, " हम १० करोड़ लोगों के एक मुकम्मिल राष्ट्र हैं, हम अपनी विशिष्ट संस्कृति, सभ्यता, भाषा, साहित्य, कला, भवन निर्माण कला, नाम, उपनाम, मूल्याँकन की समझ, अनुपात, कानून, नैतिक आचार संहिता, रिवाज, कलैण्डर, इतिहास, परंपरा, नज़रिया, महत्वकाँक्षाओं के चलते एक राष्ट्र हैं. संक्षेप में हमारा इंसानी जीवन पर और जीवन के बारे में एक विशिष्ट नज़रिया है लिहाजा किसी भी अंतर्राष्ट्रीय नियम कायदे कानूनों के मद्दे नज़र हम एक राष्ट्र हैं." (जोर हमारा) इस व्यक्तव्य से भाषा के महत्व और उसकी गंभीरता को समझा जा सकता है.

उर्दू के कट्टर पक्षपाती थे  भगत  सिंह  भी  लेकिन .....
१९२४ में भगत सिंह द्वारा लिखे एक महत्वपूर्ण लेख (पंजाबी की भाषा और लिपि की समस्या) से यह पता चलता है कि उर्दू-पंजाबी भाषा में टकराव पंजाब में काफ़ी पहले से था, पंजाबी की लिपी क्या हो इस प्रश्न को लेकर ये दोनों समुदाय आमने सामने थे, इस लेख का उद्धर्ण यहाँ प्रासंगिक होगा, भगत सिहं लिखते हैं- "पंजाब की भाषा अन्य प्रांतों की तरह पंजाबी ही होनी चाहिये थी, फ़िर क्यों नहीं हुई? यह प्रश्न अनायास जी उठता है, परन्तु यहाँ के मुसलमानों ने उर्दू को अपनाया. मुसलमानों में भारतीयता का सर्वथा अभाव है, इसीलिए वे समस्त भारत में भारतीयता का महत्व न समझकर अरबी लिपि तथा फ़ारसी भाषा का प्रचार करना चाहते हैं. समस्त भारत की एक भाषा और वह भी हिंदी होने का महत्व उन्हें समझ में नहीं आता. इसीलिए वे तो अपनी उर्दू की रट लगाते रहे और एक ओर बैठ गए." उर्दू के मुसलमान अलमबरदारों की व्याख्या करते हुए वह इसी लेख में आगे अत्यंत सारगर्भित आंकलन करते हुए लिखते हैं.
"वे उर्दू के कट्टर पक्षपाती है. इस समय पंजाब में इसी भाषा का जोर भी है. कोर्ट की भाषा भी यही है, और फ़िर मुसलमान सज्जनों का कहना यह है कि उर्दू लिपि में ज़्यादा बात थोड़े स्थान पर लिखी जा सकती है. यह सब ठीक है, परन्तु हमारे सामने इस समय सबसे मुख्य प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है. एक राष्ट्र बनाने ले लिये एक भाषा होना आवश्यक है, परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता. उसके लिये कदम-कदम चलना पड़ता है. यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देनी चाहिए. उर्दू लिपि तो सर्वांगसम्पूर्ण नहीं कहला सकती, और फ़िर सबसे बडी बात तो यह है कि उसका आधार फ़ारसी भाषा पर है. उर्दू कवियों की उड़ान, चाहे वे हिंदी (भारतीय) ही क्यों न हों, इरान की साकी और अरब की ख़जूरों को ही जा पहुँचती हैं. काज़ी नज़र-उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार-बार है, परन्तु हमारे पंजाबी हिंदी-उर्दू कवि उस ओर ध्यान तक भी न दे सके. क्या यह दु:ख की बात नहीं? इसका प्रमुख कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है. उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फ़िर उनके रचित साहित्य से हम कहाँ तक भारतीय बन सकते हैं? केवल उर्दू जैसी साहित्यिक भाषा मे उन ग्रंथों का अनुवाद नहीं हो सकता, परन्तु उसमें ठीक वैसा ही अनुवाद हो सकता है, जैसा कि एक ईरानी को भारतीय संबंधी ज्ञानोपार्जन के लिये आवश्यक हो"
उर्दू के तत्कालीन समाचार पत्रों पर टिप्पणी करते हुए वह लिखते हैं.
"उर्दू के कट्टरपक्षपाती मुसलमान लेखकों की उर्दू में फ़ारसी का ही आधिक्य रहता है. "ज़मींदार" और "सियासत" आदि मुसलमान- समाचार पत्रों में तो अरबी का जोर रहता है, जिसे एक साधारण व्यक्ति समझ भी नहीं सकता. ऐसी दशा में उसका प्रचार कैसे किया जा सकता है? हम तो चाहते हैं कि मुसलमान भाई भी अपने मज़हब पर पक्के रहते हुए ठीक वैसे ही भारतीय बन जायें जैसे कि कमाल टर्क हैं. भारतोद्धार तभी हो सकेगा. हमें भाषा आदि के प्रश्नों को धार्मिक समस्या न बनाकर खूब विशाल दृष्टिकोण से देखना चाहिये".


बंगालियों पर जबरन थोपा उर्दू

भगत सिंह के उपरोक्त कथन और भाषा संबंधी मीमांसा, खासकर उर्दू और उसके पैरोकारों के संदर्भ में एक सशक्त समझ को रेखांकित करती है जिससे तत्कालीन समाज और राजनीति में भाषा के प्रश्न से जुड़े तापमान को भलिभांति भांपा जा सकता है. भारत की आज़ादी और पाकिस्तान बनने के बाद उर्दू के लिये हुए संघर्ष को समझने के लिये हमें पाकिस्तान के इतिहास को ही टटोलना होगा. पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा उर्दू ही होगी, यह पहले ही मुस्लिम लीग ने स्पष्ट कर दिया था लेकिन भविष्य में इस प्रश्न को लेकर कितना गंद-गुबार छिपा है इसे कौन जानता था? बंटवारे से पहले जिन्ना १० करोड़ मुसलमानों के स्वयंभू नेता थे, लेकिन जो पाकिस्तान उन्हें मिला, दुर्भाग्य से उसमें अधिसंख्यक ४.५ करोड़ बंगाली मुसलमान थे जिन्हें अपनी भाषा और संस्कृति से बेहद प्यार था. जो तर्क जिन्ना ने भारत के बंटवारे से पहले अपने लिये दिये थे, उन्हीं तर्कों के आधार पर बंगाली समाज अपने हिस्से का "पाउण्ड आफ़ फ़्लेश" मांग रहा था जिसे मुस्लिम लीगी सामंती नेतृत्व अपने दंभ के चलते देने को तैयार नहीं था. नवनिर्मित पाकिस्तान में बंगाली मुसलमानों का बहुमत होते हुए भी इसके दंभी नेतृत्व ने उर्दू को राष्ट्र भाषा का दर्जा दे दिया. पृथ्वी पर बने पहले नवजात मुस्लिम राष्ट्र को सबसे पहले भाषा के सवाल पर ही चुनौती झेलनी पडी. पूर्वी पाकिस्तान (ईस्ट बंगाल) में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिये जाने पर वह गहरे विक्षोभ में डूब गया.

एकुशे त्रासदी
इसी विरोध के मद्दे नज़र जिन्ना ने ढाका विश्वविद्यालय के लार्ड कर्जन हाल में २१ मार्च १९४८ को अपने भाषण में कहा:
"मुझे आपके सामने यह स्पष्ट कर देना है कि पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा उर्दू होगी. जो भी इस संदर्भ में आपको गुमराह करने की कोशिश करेगा वह असल में पाकिस्तान का दुश्मन है. बिना एक राष्ट्रीय भाषा के कोई भी देश मजबूती के साथ एकजुट नहीं रह सकता और न ही कार्य कर सकता है. दूसरे देशों का इतिहास देखो इसीलिये जहाँ तक पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा का प्रश्न है, वह उर्दू ही होगी"
पूरा हाल इस व्यक्तव्य के बाद "नो" से गूँज गया, राष्ट्र पिता (क़ायदे आज़म) जिन्ना को अपने ही नौनिहाल देश में यह पहले सार्वजनिक विरोध और उसकी नीतियों को इंकार का सामना था. सितंबर ११,१९४८ को जिन्ना की मृत्यु के बाद लियाकत अली ख़ान ने अपने भरपूर सामंती स्वरुप में उर्दू की वकालत जारी रखी जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप बंगाली मुसलमानों में बंगाली भाषा के लिये मोह भी साथ-साथ बढ़ता गया. पाकिस्तानी हुकमरानों ने इस विवाद से निपटने के लिये एक भाषा समिति भी बनायी जिसकी वाहियात सिफ़ारिशें गुप्त रखी गयी. बंगाली भाषा को सार्वजनिक रुप से हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा बता कर (क्योंकि उसका आधार संस्कृत है) उसका शुद्धिकरण करने जैसी तकमीलें निकाली गयी. रवीन्द्र संगीत, नज़रुल गीती को हिंदु संस्कृति का वाहक घोषित किया गया जिसके चलते गैर-मुस्लिम बंगाली समाज में भी असुरक्षा का भाव लगातार गहराता गया. भाषा के मसले पर सभायें, धरना प्रदर्शन होने से लगातार बंगाल का राजनैतिक माहौल गर्माता रहा जिसे उर्दू के पैरोकारो-सामंतो-नेताओं ने पाकिस्तान के विरुद्ध चल रही साजिश बताया. इसी महौल में २१ फ़रवरी १९५२ को ढाका में एक प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान हकुमत ने गोली चला दी जिसमें सैंकडों जख्मी हुये और विश्वविद्यालय के चार छात्रों की मौत हुई जिनके नाम रफ़ीक, जब्बार, सलाम और बरक़त थे. इस घटना को बंगलादेश के इतिहास में "एकुशे" त्रासदी के नाम से जाना जाता है, इन्हीं चार लोगों की स्मृति में ढाका की शहीद मिनार बनायी गयी और इन्हीं चारों शहीदों को बंगाल राष्ट्र के अग्रज नेताओं के रुप में आज भी जाना जाता है. १९५२ से लेकर १६ दिसंबर १९७१ के १९ वर्षों के इतिहास में वेस्ट पाकिस्तान को बंगाल पर एक औपनिवेशिक ताकत और उनके ज़ुल्मों सितम में कोई ३० लाख बंगालियों की हत्यायें इसी उर्दू अदब के प्रेमियों, दंभियों, फ़ासिस्ट ताकतों ने अपनी नाजाएज़ संतान जमाते इस्लामी जैसे संगठन, फ़ौज, पुलिस, खुफ़िया इदारों आदि के जरिये करवायी.


उर्दू के नाम की ज़बरदस्ती ने किया पाक का विभाजन

उर्दू भाषी अल्पसंख्यक होते हुए भी, अपने अहंकारी-दंभी संस्कारों के चलते पूरे पाकिस्तान पर इस भाषा को थोपने का नतीजा यह हुआ कि अपने जन्म के कुल २४ वर्ष के भीतर इसे पूर्वी पाकिस्तान से हाथ धोना पडा. इन २४ सालों में यदि बंगाली समुदाय का संसद, फ़ौज, सरकारी नौकरियाँ, पुलिस आदि में अनुपातिक प्रतिनिधित्व देखें तब यह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी पाकिस्तान के हुकमरान इन्हें कितने संदेह की दृष्टि से देखते थे. भाषा के साथ-साथ ईस्ट बंगाल से जुडे अन्य राजनैतिक प्रश्नों/कारणों पर यहाँ टिप्पणी करना न तो प्रासंगिक है न ही यथोचित होगा. आज़ाद बंगलादेश के लिये ऐकुशे फ़रवरी एक राष्ट्रीय पर्व बन गया है, राष्ट्र भक्ति और बंगला भाषा के प्रेम से ओतप्रोत कई मधुर काव्यरचनायें की गयी हैं, हर साल उन चारों शहीद छात्रों को भावभीनी श्रद्धांजलि पूरे बंगला देश वासियों द्वारा अर्पित की जाती है.


भारत में उर्दू
भारत में उर्दू भाषा का चरित्र मूलत: कुलीन वर्गीय ही रहा, खासकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जिसकी स्थापना का मूल उद्देश्य भारतीय मुस्लिम सामंतों, नवाबों और मध्य-उच्च वर्ग के मुस्लिम बच्चों को अंग्रेज़ी तालीम देना था (सर्व साधारण मुसलमानों के लिये नहीं) लिहाज़ा वहां तालीम लेने गये कुलीन मुस्लिम नौजवानों ने इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को भलि भांति निभाया. इसी विश्वविद्यालय के पढ़े सूरमाओं के एक बड़े वर्ग ने सबसे पहले उसी मुल्क को तोडने का वैचारिक आधार पैदा किया जहां वह पले बढ़े, आज भी यह विश्वविद्यालय उन देश भंजक कवियों और उर्दू भाषा के नाम पर सीना ठोक ठोक कर दंभ मारने वालों के कसीदे पढ़ने में कोई कोताही नहीं बरतता बल्कि उनके लिये सालाना जलसों का आयोजन भी होता है.(ज़रा भगत सिंह के व्यक्तव्यों को यहां फ़िर दोहरायें- आज भी उतने ही सार्थक हैं) इसी विश्वविद्यालय के पढ़े दानिश्वरों ने पाकिस्तान में जुबान को मज़हब से जोड़ने वाली अमरनाल की संचरना की जिसके चलते, न केवल भाषा को ही नुकसान उठाना पडा बल्कि पूरे इतिहास को सिरे से खारिज करने की मंशा में एक पूरी पीढी को विषाक्त किया.
जिसे अपने अतीत के सही अर्थों का मान नहीं रहा और न ज्ञान. आज इन्हीं उर्दू के दंभियों द्वारा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बोली जाने वाली पंजाबी ज़ुबान जिसकी पैदाइश भारतीय है, उसकी नयी लिपि फ़ारसी-अरबी के आधार पर विकसित की जा रही है. जिस विषैली मानसिकता के चलते उन्होंने बंगला भाषा के शुद्धीकरण का प्रयास १९५० के दशक में किया था, उसी दूषित मानसिकता के चलते पंजाबी की इबारत लिखने में ,उल्टे हाथ से शुरु करने और उसका गुरुमुखी प्रभाव समाप्त कर उसे अरबी-फ़ारसी लिपि देने से साफ़ स्पष्ट हो जाता है कि ये किस मानसिकता से ग्रस्त तबका है. उर्दू से जुड़े मज़हबी कूपमंडूपों के चलते पाकिस्तान में आज भी कोई प्रोफ़ेशनल कोर्स (डाक्टरी, इंजीनियरिंग, कम्प्युटर साईंस आदि) उर्दू भाषा में नहीं पढाया जा सका और न ही इसकी वैज्ञानिक शब्दावली विकसित हो सकी जबकि रुस, चीन, जापान, जर्मनी जैसी और कई मिसालें इतिहास में मौजूद थी. इन देशों ने अपनी मादरी ज़ुबान में विज्ञान, दर्शन, गणित जैसे विषय पढ़- पढ़ा कर दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की थी, उर्दू के कंधे पर बैठ कर पाकिस्तान द्वारा यह सफ़र आसानी से तय कर लिया जाना चाहिये था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ, बल्कि हुआ इसके विपरीत, अज़ादी से पूर्व अगर कुछ चुनिंदा अदीबों को लें (इकबाल, फ़ैज़, अहमद अली, इब्ने इंशा, फ़राज़ आदि) जिनका उर्दू ज़ुबान में अपना मुकाम है तो वह इस लिये नहीं कि उन्होंने इस भाषा का ज्ञान अर्जित किया, वरन इसलिये कि इन दानिश्वरों ने दुनिया भर की दूसरी ज़ुबानों (खासकर अंग्रेज़ी,जर्मन) में फ़ैले पड़े ज्ञान को इकठ्ठा करके उर्दू के पाठकों में बांटा और उन्हें संवर्धित किया. समकालीन पाकिस्तानी दानिश्वरों की फ़ेहरिस्त में मुझे ऐसा कोई नाम नहीं दिखाई देता जिसने सिर्फ़ उर्दू के बूते पर कोई किला फ़तह किया हो, क्या डा. अब्दुस सलाम को भौतिकी का नोबिल पुरुस्कार इसके लिये मिला? परवेज़ हूदभाई, अब्दुल कादिर, आयशा सिद्दिका, अकबर स. अहमद, तारिक फ़ातेह, तारिक अली जैसे अंतरार्ष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी विद्वानों की जहनी और तालीमी बुनियादों में उर्दू की भूमिका तलाशना भुस के कोठे में सूईं ढूँढ़ने जैसा है और इस तर्क पर कोई मूर्ख ही यकीन करेगा कि आज इस युग में ज्ञान के शिखर पर पहुँचने के लिए उर्दू भाषा को उसके अनुगामियों ने किसी ऐसे मुकाम पर पहुँचा दिया है कि उससे गुज़रे बिना यह संभव नहीं.


जंग-ए-आज़ादी में  दी उर्दू रचनाकारों ने कुर्बानी 

यह, भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि उर्दू भाषा के साहित्यकारों की एक लंबी फ़ेहरिस्त उन लेखकों से भरी पड़ी है जिन्होंने भारत में इंकलाब करने की कसमें खायी थी, सज्जाद ज़हीर से लेकर कैफ़ी आज़मी तक बायें बाजु के इन तमाम दानिश्वरों, शायरों, अफ़साना निगारों ने जंगे आज़ादी में बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी है. १९४३ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (अधिकारी लाईन के चलते) ने पाकिस्तान विचार को लेनिन के सिद्धांत के आधार पर खुली मान्यता दी और बाकायदा मुस्लिम साथियों को पाकिस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी बनाने के लिये भेजा गया, सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के पहले जनरल सेक्रेट्री भी बने, उनके बाद फ़ैज़ साहब ने किसी हद तक परचम थामे रखा बावजूद इसके कि उन्हें कई दौरे हुक्मरानों ने जेल की सलाखों के पीछे डाले रखा फ़िर भी वह मरते दम तक अपने इंकलाबी मकसद से नहीं हटे. दुर्भाग्य से ये तमाम नेता उर्दू भाषी ही थे जो अपनी आला तालीम के बावजूद कोई बड़ा ज़मीनी आंदोलन शायद इसी लिये नहीं खडा कर पाये क्योंकि इनकी तरबियत भी कुलीन-सामंती निज़ाम, ज़ुबान, उसूलों और रस्मों-रिवाज में ही हुई थी. इन्होंने मुशायरों में भीड़ तो इकठ्ठी की लेकिन उसे जलूस बना कर सड़क पर लाने में सफ़ल न हुये. शायरी से ’किताबी और काफ़ी इंकलाब’ पाश कालोनी के कुछ मकानों में तो जरुर हुआ लेकिन सुर्ख इंकलाब का परचम कभी घरों के उपर नहीं फ़हराया जा सका. इन्हें लेनिन पुरुस्कार जैसे बड़े बड़े एज़ाज़ तो हासिल हुए लेकिन व्यापक जनता का खुलूस इन्हें न मिल सका. आज भी कमोबेश यही हकीकत हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों देशों में देखी जा सकती है. इस ज़ुबान के शायर/लेखक टेलीवीज़न चैनलों पर अच्छी बहस करते तो देखे जा सकते हैं लेकिन दांतेवाडा काण्ड-सोनी सोरी-आज़ाद हत्याकाण्ड आदि पर जावेद अख्तर-गुलज़ार कभी नहीं बोलते देखे जा सकते, वहा अरुंधति राय उन्हें पटखनी देती नज़र आती हैं. नतीज़ा यही हुआ कि सलमान तासीर की हत्या के बाद उसके विरोध में चंद आदमी सड़क पर उतरे जबकि उसके कातिल को अदालत में वकीलों की तरफ़ से किसी कौमी हीरो जैसा सम्मान मिला.


उर्दू का भविष्य पाकिस्तान में
उर्दू का भविष्य पाकिस्तान में भी दिन ब दिन अंधेरे की गर्त में घुसता प्रतीत हो रहा है, जिन हालात से पाकिस्तान आज बावस्ता है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ये मुल्क एक बार फ़िर टूटन के कगार पर है. अमेरिका की मौजूदगी, उसके साथ टकराव और पाकिस्तानी समाज के मूलभूत आंतरिक अंतर्विरोध उसे फ़िर तोड़ से दें तो ताज़्ज़ुब न होगा. बलोचिस्तान की स्वतंत्रता के बाद स्वाभाविक रूप से पंजाब, सिंध अपनी अपनी राष्ट्रीयताओं की तरफ़ तेज़ी से बढ़ेगें जैसे नार्थ वेस्ट प्रोविन्स में पठान बढे़ हैं, इस राज्य में पश्तु ज़ुबान राज्य भाषा हो ही चुकी है, पंजाबी अपनी ज़ुबान लेंगे, सिंधी अपनी और बलोच अपनी ही भाषा को महत्व देंगे...बचे मुहाजिर, जिनकी हकीकत से आज पूरी दुनिया दो चार है, उनका नेता अल्ताफ़ हुसैन लंदन में बैठा तकरीरे करता है और दिल्ली में आकर मुहाजिरों की ख़ता माफ़ करने और उन्हें वापस हिंदुस्तान में पनाह देने की ख्वाईश का ऐलान पहले ही कर चुका है, ऐसे हालात में उर्दू का यह डगमगाता जहाज़ कितनी दूर और आगे परवाज़ करेगा यह कहना अभी मुश्किल है लेकिन कयासा लगाया ही जा सकता है.


हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान
भारत में उर्दू ज़ुबान पर मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने अपनी रोटियाँ सेक-सेक कर इसे शुद्ध रुप से सांप्रदायिक प्रश्न बना दिया है, जितना प्रचार उर्दू के नाम पर किया जाता है उससे अधिक गति से "हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान" शहर, कस्बों और गांवों की दीवारों पर पुता दिखाई देता है. बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडू (मद्रास) आदि जगह ज़मीनी स्तर पर उर्दू के प्रचार-प्रसार के संजीदा काम हुए हैं, मदरसों से पढे हुए छात्र आमतौर पर धार्मिक इदारों में ही खप कर रह जाते हैं जिनका व्यापक समाज के हित में कोई रचनात्मक भूमिका न के बराबर है, लेकिन सियासी मसले पर यह तबका आंदोलित होकर जब सड़क नापता है तब उसकी प्रतिक्रिया आवश्यक रुप से ज़बरदस्त होती है. मदरसे में मिली तालीम का उद्देश्य भी मात्र उर्दू के विस्तार, प्रचार के लिये नहीं हुआ वरन अरबी भाषा की प्रास्तावना रचने के लिये उर्दू भाषा को सिखाना अनिवार्य समझा गया ताकि इस भाषा में रचा मज़हबी साहित्य छात्रों को पढ़ाया जा सके, इसका मूल मकसद भी इस्लाम की तालीम, जिसे अरबी भाषा के बिना अधूरा माना जाता है, के लिये ही किया गया. मदरसा चलाने वाले तबके का चरित्र मियां जी, शेख जी, खां साहबों आदि की जूतियों की हिफ़ाज़त करना ही अधिक रहा है क्योंकि इन्हीं के चंदे की बुनियाद पर मदरसे चलते हैं और यदा कदा जब भी खां साहब, शेख जी, मियाँ जी को इनके सियासी समर्थन की जरुरत होती तब मदरसे के उस्ताद से लेकर तालीबे इल्म तक सब सड़क पर आते, उर्दू के प्रश्न पर इस तबके का सियासी इस्तेमाल भारतीय उपमहाद्वीप में अफ़गानिस्तान से लेकर बंगलादेश तक पिछले १०० सालों में बहुत कायदे से देखा जा सकता है. अशरफ़ मुसलमानों के इस राजनैतिक चरित्र की व्याख्या अलग से की जानी चाहिये, चाहे उर्दू का प्रश्न हो या पाकिस्तान का, इस अल्पसंख्यक तबके ने अपने मुफ़ाद के लिये बहुसंख्यक मुसलमानों का ज़बरदस्त सियासी, समाजी और ज़हनी इस्तेमाल (शोषण) किया है. भाषा हो या मज़हब, समाज के ज़हन में अलगाव की बुनियाद डालने का काम सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी अशरफ़ तबके ने किया है जिसका खमियाज़ा सबसे ज़्यादा अजलफ़ मुसलमानों को भुगतना पड़ा है.

मज़हब की आड़ में चला भाषा का अस्त्र
मज़हब की आड़ में चला भाषा का अस्त्र, भारतीय उपमहाद्वीप में प्रतिगामी शक्तियों का एक अभेध अस्त्र साबित हुआ है, इसे धर्म के साथ जोड़ कर प्राय: तमाम तर्क और विवेक की रोशनियों को अपने क्रूर इरादों के कठोर पैरों तले कुचलने के प्रयास किये गये हैं. ये प्रतिक्रियावादी ताकतें यह भूल जाती हैं कि मानव इतिहास के क्रम में, इंसान ने कई बार अलग अलग भाषाओं का चोला ओढ़ा है, देशकाल के प्रभाव में धर्म, भाषा, संस्कार आमतौर पर आते-जाते रहे हैं लेकिन फ़िर भी इंसानी जीवन की किलकारियाँ पृथ्वी के कोने-कोने पर घटित हुई, इंसान ने बार-बार मिट कर फ़िर-फ़िर फ़ुदकना, चहकना, बोलना शुरु किया, यह सिलसिला अभी थमा नहीं है. यह कोई जरुरी नहीं कि जो आज बहुत अपना है, कल लुप्त न होगा? प्रतिकूल परिस्थितियों में सिर्फ़ वही बचेगा जिसमें बदलते माहौल के मुताबिक खुद में बदलाव करने की क्षमता होगी. काश पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपने अंहकार के चलते उर्दू को राजकीय भाषा बनाने से पहले किसी प्रकार का जनमत संग्रह करा लिया होता और वही करते जिसे जनता अपना मत देती, तब इतिहास आज कुछ और ही होता. निसंदेह वह उस भाषा के हामियों से मात खा गये जिसका पहला उपन्यास " करुना ओ फुलमोनिर बीबारन" १८५२ में लिखा गया था जबकि उर्दू में डिप्टी नज़ीर अहमद का लिखा पहला नाविल सौलह साल के बाद -" मिरत अल उरुस" १८६८ में छपा. दंभ इंसान को सच नहीं देखने देता, अक्सर उसे मुँह की खानी पड़ती है, यही कडुवा सबक इतिहास ने हमें सिखाया है, अफ़सोस कि आज भी कुछ लोग उसी मज़हबी, ज़हनी कैफ़ियत से दो चार हैं जिसका प्रदर्शन १९५२ में देखने को मिला था, परन्तु इतिहास इन्हें फ़िर पहले से भी अधिक कडुवा सबक सिखाने के लिये सीना ताने खड़ा है.

गली कूचों से ही मिलेगी सच्ची राह

उर्दू भाषा को सच्ची राह और दिशा हिंदुस्तान के गली कूचों से ही मिलेगी, इस भाषा का प्रचार जितना जड़ों में होगा उतना ही इसके सिर से सामंति बोझ कम होगा, जितनी भी यह जन भाषा होगी उतनी ही सरस और सहज होगी. (गांधी ने जिस भाषा को "हिंदुस्तानी" नाम दिया था- वह यही थी) जब-जब इसे महारानी बना कर पेश किया जाता रहेगा तब-तब इसके वंश और खानदान की पड़ताल होगी, इसके खिलाफ़ साजिशें होंगी, इसे हुक्मरान की नज़र से देखा जाता रहेगा जिसका नतीजा हम देख ही चुके हैं, जिस दिन यह दूसरी भाषाओं की बहन बन गयी, तभी से इसकी हिफ़ाज़त का जिम्मा स्वत: सभी ले लेंगे (आज भी इस सोच के लोग है जो इसी जज़्बे के चलते इसे न केवल सम्मान देते हैं बल्कि उसे अपने कुनबे की समझ कर इसकी सेवा करते हैं), सभी इसकी सेहत का, दाने-पानी का, इसके मिलने जुलने वालों को वही तवज्जों देंगे जैसे बहनों को मिली है, उन्हें दी जाती है, इसे भी दी जायेगी..शर्त यह है कि इसे महारानी के दंभी तख्तोताज़ से उतरना होगा जहां इसे नाजायज़ तरीके से कुंठित, दूषित, मानसिक तौर पर दिवालिया सियासी लोगों ने जबरन बैठा दिया है.
(२१ फ़रवरी,बंगलादेश शहीदी दिवस) 

लेखक की कविता यहाँ पढ़ें



(लेखक-परिचय:
जन्म: १६ जनवरी १९६६ को जिला मेरठ के मवाना कस्बे में.
शिक्षा: दर्शन में स्नातकोत्तर

सृजन:कविताओं और लेखों का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन

सम्प्रति: कनाडा में रोज़गार

संपर्क: shamshad66@hotmail.com)


read more...

शायर क़सीम अख्तर की दुआ



हम क़लम हम ज़ुबान बन जाओ,

बन सको तो इन्सान बन जाओ.

तारीकी -ए- जहालत है हर सू,
नूर-ए-इल्म बनो, फैज़ान बन जाओ.

हालात -ए- जंग हों गर पैदा,
वतन-ए-अज़ीज़ का पासबान बन जाओ.

तय कर लो तरक्क़ी के मदारिज,
और बुलंदी -ए- आसमान बन जाओ.

कहलाने के वास्ते ही नहीं,
अमल से मुसल्लम ईमान बन जाओ.

मेरे और ठिकाने